Jharkhand Ki Adivasi Kala Parampara

झारखंड की आदिवासी कला परंपरा

भाषा: हिंदी

प्रकाशन तिथि: 23 मार्च 2023

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन

झारखंड एक प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर राज्य है और इसकी कला की दृष्टि से एक समृद्ध धरोहर है। दशकों पहले, हजारीबाग के पास इसकी शैलचित्रों की खोज करते समय, दुनिया ने हमारे पूर्वजों के कितने कुशल चित्रकला कला का पता चला। झारखंड की धरती पर अनेक आकृतियाँ और निशान दिए गए हैं, जिनसे शोधकर्ता अब प्रकृति की इस अद्वितीय रचना को समझने का प्रयास कर रहे हैं।

संताल समाज के लोगों द्वारा सदियों से ‘जादोपटिया कला’ के प्रति खासा रुझान देखा गया है। इनके चित्रों में जीवन का जितना गहरा सार है, उतना ही गहरा रेखाओं का विस्तार है । यह कला संताली समाज में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित होती रही है।

झारखंड का जनजातीय समाज इतना हुनरमंद है कि अपनी जरुरत की चीज से लेकर अन्य समाज की जरुरतों को भी पूरा करने में वह सक्षम है। शिल्पकला, चित्रकला और देशी उत्पादों से जरूरत के असंख्य सामान तैयार करने में जनजातीय समाज के कौशल का कोई सानी नहीं है।

इनके घरों की दीवारों पर इतनी अद्भ्रुत चित्रकारी होती है कि उसकी मिसाल दुर्लभ है | मिट्टी, गेरू और पत्तों से बने रंण इतने सजीव तरीके से दीवारों पर उभरते हैं कि लगता है, सारा गाँव ही कलाकारों का गाँव है । इनकी कलाकृतियों में सिर्फ हुनर ही नहीं दिखता, बल्कि विभिन्‍न आकृतियों के माध्यम से समाज को संदेश भी देते हैं कि देखो, हमारा जीवन फूल, पत्ती, पशु-पक्षी और प्रकृति से कितनी गहराई से जुड़ा है।

इस बूक को 53 से भी आधिक् positive feedback ओर् ratings मिला है

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About The Author:

मनोज कुमार कपरदार, झारखंड प्रदेश के बोकारो जिले के बगदा गाँव में 25 फरवरी, 1965 को पिता श्री शिवनारायण कपरदार और माता श्रीमती मोती देवी के घर में पैदा हुए। मनोज कुमार कपरदार ने राँची में रहकर दो दशक से पत्रकारिता में सक्रिय भूमिका निभाई है। वह विभिन्न विषयों पर सैकड़ों रचनाएँ लिख चुके हैं, जो क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं, और उन्होंने अकाशवाणी के माध्यम से भी प्रसारित किया है।

उन्होंने चित्रकला प्रतियोगिताओं में भी प्रतिष्ठित पुरस्कार जीते हैं। उनकी व्यंग्य-चित्र भी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं, जैसे कि ‘प्रभात खबर’, ‘वनांचल प्रहरी’, ‘घर’, ‘ऑथेंटिक’ आदि। उन्होंने ‘झारखंड दर्पण’ नामक एक पुस्तक का भी प्रकाशन किया है। उन्होंने कई साझा काव्य-संग्रहों में भी योगदान दिया है, जैसे ‘साहित्य उदय’, ‘एकाक्ष’, ‘साहित्य धरती’, “मेरा गाँव’, ‘भारत @ 75’ और ‘मेरे पिता’ में। उन्होंने विनोद बिहारी महतो कोयलांचल विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में कविता की भी पढ़ाई की है।

Top reviews from India

Reviews 1
यह पुस्तक झारखंड के आदिवासी लोगों के बारे में उनकी विशिष्ट संस्कृति, भाषा और विरासत के बारे में है। यह पुस्तक आदिवासियों की लोककथाओं और उनकी संस्कृति को दर्शाती है। यह समग्र रूप से आदिवासियों को एक नया दृष्टिकोण देता है। इसे लेखक ने खूबसूरती से लिखा है।

Reviews 2
झारखंड का जनजातीय समाज इतना हुनरमंद है कि अपनी जरुरत की चीज से लेकर अन्य समाज की जरुरतों को भी पूरा करने में वह सक्षम है। शिल्पकला, चित्रकला और देशी उत्पादों से जरूरत के असंख्य सामान तैयार करने में जनजातीय समाज के कौशल का कोई सानी नहीं है।

मिट्टी, गेरू और पत्तों से बने रंण इतने सजीव तरीके से दीवारों पर उभरते हैं कि लगता है, सारा गाँव ही कलाकारों का गाँव है । इनकी कलाकृतियों में सिर्फ हुनर ही नहीं दिखता, बल्कि विभिन्‍न आकृतियों के माध्यम से समाज को संदेश भी देते हैं कि देखो, हमारा जीवन फूल, पत्ती, पशु-पक्षी और प्रकृति से कितनी गहराई से जुड़ा है।

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मनोज कुमार कपरदार द्वारा लिखित “झारखंड की आदिवासी कला परंपरा” एक प्राकृतिक और सौंदर्य से भरी झारखंड की कला की भूली-बिसरी रूपरेखा प्रस्तुत करती है। इस किताब में झारखंड के आदिवासी समाज की ‘जादोपटिया कला’ और व्हाइट टाइगर सफारी के विश्वप्रसिद्ध मुकुंदपुर के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई है।

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