वारली पेंटिंग क्या है कितने प्रकार की है

दोस्तों पूरी दुनिया में मनुष्य एक मात्र ऐसा जीव है जो अपनी संवेदनाएं, इच्छाएं  और अनुभूति को दर्शाने के लिए , लेखन एवं  चित्रों का उपयोग करता है 

इतिहास की ओर देखे जब लिपि का आविष्कार नहीं हुआ था तब के समय के आदिम लोग चित्रकला से अपनी संवेदनाएं अभिव्यक्त करते थे

इक्कीसवीं सदी में हजारों वर्ष पुरानी लिपि ढूंढ़ली ली गई है फिर भी लोग इंटरनेट के माध्यम से कई प्रकार की चित्रकला सामान्य भाषा में कहें तो स्माइली या एम्मॉजी से अपना अंदाज अपनी भावनाएं व्यक्त करते है इस तरह आदि काल से लेकर आधुनिक काल में भी चित्रकला ने अपनी एक खास जगह बनाई हुई है जो दुनिया में समय के साथ हर पल बदलती रहती है लेकिन आदिम काल में या कहें दुनिया के शुरुआती वो वक्त जिसमें मानव जीवन की शुरुआत हुई थी उस समय में आदिवासी लोग अपनी जिस चित्रकला का उपयोग करते थे वो आज दस हजार वर्ष के बाद भी अवशेष के रूप में प्रमाणभूत है

मध्य देश में भीमबेटका की गुफा की दीवारों पर दर्शाए गए चित्र आदिवासियों की उस समय की संस्कृति और जीवन शैली का तरीका बताती है जिससे मालूम पड़ता है कि आदिमानव कला नाम का बड़ा उपासक था

आज ऐसी ही एक प्राचीन कला जो आधुनिक विश्व में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आदिवासी की पहचान का जरिया बन चुकी वारली चित्रकला (Warli painting) जो आज सरकारी इमारत व सरकारी समारोहों की शान बनी हुई है इसी नाम की  कला को हम गहराई से जानने का प्रयत्न करेंगे

नमस्कार दोस्तों में आदिवासी स्टेटस ब्लॉग पर आपका  स्वागत करता हूँ

आधुनिक भारत में वारली चित्रकला (Warli painting) को उच्च स्थान देने का श्रेय वारली समुदाय से महाराष्ट्र के सरहदी गांवों के जिव्य सोमा माशे को जाता है 


Image credit : Wikipedia

वारली चित्रकार जिव्य सोमा माशे जी की प्रमख जानकारी  ( warli painting painter information)

आधुनिक वारली चित्रकार जिव्य सोमा माशे
जन्म१९३४
जन्म स्थल तलासरी, ठाणे, महाराष्ट्र, भारत
राष्ट्रीयताइंडियन 
क्यों थे प्रचलित वारली चित्रकला
पुरस्कारआदिवासी कला के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार (१९७६)
शिल्प गुरु पुरस्कार
प्रिंस क्लाउस अवार्ड
पद्मश्री
जनजाति वारली जनजाति समुदाय 
मृत्यु 14  मई 2018 
फॅमिली दो बेटे सदाशिव और बलू और एक बेटी है 

वारली पेंटिंग क्या है (what is warli painting in hindi)

वारली एक आदिवासी समुदाय है जिसका अर्थ भूमि का टुकड़ा या मैदान होता है वारली आदिवासी लोग प्रकृति को अपनी मां समझते हैं इसलिए वहां प्रकृति पूजक कहलाते हैं यह समुदाय सह्याद्री पर्वत श्रृंखला में महाराष्ट्र में दहानू , तालसरी, जोहार, पालघर, मौकाडा, विक्रमगड तथा गुजरात के डांग, वास्ता, धरमपुर और दादरा, नगर हवेली के जंगल विस्तार में रहते हैं

वह वारली समुदाय भारत के मुख्य भील समुदाय की एक बेटा जाती है हर कोई समुदाय अपने प्रसिद्ध कला की वजह से जाने जाते है वैसे ही वारली समुदाय अपनी अलग चित्रकला जिसे वारली चित्रकला  (Warli art) कहते हैं

आज महाराष्ट्र, गुजरात और मध्य प्रदेश के आदिवासी वारली समुदाय यहां वारली चित्रकला (Warli art) के माध्यम से अपना जीवन निर्वाह करते हैं

वारली नाम आते ही हमारी नजर समक्ष वारली चित्रकला का खूबसूरत दृश्य उभर आता है वारली चित्र कला वारली  आदिवासियों की विरासत है  जिसमें आदिवासियों गोबर और मिट्टी के लीपापोती वाले घरों की दीवारें और उनके देव स्थानों पर चावल का आटा और नेचुरल गोंद के मिश्रण से विविध आकारों में चित्र बनाते हैं

यह चित्र त्यौहार या  प्रसंग के अनुरूप अलग अलग दृश्य में बने हुए होते हैं जो विविधता को उजागर करता है विवाह गृहप्रवेश, फसल कटने, जैसे अवसर त्योहार पूर्वजों से चली आ रही परंपरागत पूजा के दरम्यान घर के मुख्य दीवारों और पूजा स्थानों में वारली चित्र बनाते हैं

जिससे ज्यादातर त्रिकोण, वर्ग, गोल आकार में सूर्य या चंद्र, सितारे, वृक्ष, जानवर, पंछी, मनुष्य, नदी, तालाब,और पर्वत अर्थात आदिवासियों में परंपरागत से पूजनीया नेचुरल दृश्य को चित्रित किया जाता है

यहां चित्रकला आदिवासियों के नृत्य, विवाह, उत्सव, धार्मिक पूजा समारोह, खेती, जैसे पारंपरिक जीवन शैली और अवसरों का प्रतिनिधित्व करते रेखा चित्र को अभिव्यक्त करते हैं वारली चित्रकला आदिवासी समाज का गर्व है और सांस्कृतिक बौद्धिक संपत्ति

द पेंटेड वर्ल्ड ऑफ़ द वार्लीस पुस्तक के लेखक श्री यशोधर डालमिया के मुताबिक भारतीय चित्रकला ढाई हजार से लेकर तीन हज़ार वर्ष पूर्व से अस्तित्व में मौजूद है

वारली चित्रकला सिर्फ वारली समुदाय की जीवन शैली और संस्कृति धार्मिक उत्सव तक ही सीमित था परन्तु उसे राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर तक सफर कराने का और उस स्तर पर ख्याति देने का श्रेय महाराष्ट्र के ठाणे जिले के धामना नामक छोटे से गांव के जिव्य सोमा माशे को जाता है

वारली समुदाय के आदिवासी महिला अपनी परंपरा के मुताबिक विवाह तथा अन्य धार्मिक प्रसंग तथा उत्सव के दरमियान घर की दीवारों पर गोतरित कंसारी प्रकृति का प्रतीक जैसे कि चांद सितारे सूर्य आदि आकृति का चित्रण करती है

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वारली कला कितने प्रकार (Type of Warli painting)

वर्ली पेंटिंग को समझने में उनमें प्रयुक्त विभिन्न पैटर्न को देखे तो ये वार्ली पेंटिंग के प्रकार को दर्शाते हैं  जिसमे  हम देखते हैं की  ये दो प्रकार के होते हैं – रिचुअल और अन रिचुअल यानि के पारम्परिक और अ पारम्परिक

वारली पेंटिंग को मिले पुरस्कार और सम्मान

यह चित्रकला का व्यवसायीकरण और प्रसार तब हुआ जब जिव्य सोमा माशे यह वारली चित्रकला को उन्नीस सौ पचहत्तर में मुंबई के प्रसिद्ध जहांगीर आर्ट गिलहरी के केमोल्ड आर्ट गैलरी में प्रदर्शित के लिए लिए गई जिव्य सोमा माशे जी ने बड़े कागज पर गोबर का पतला लेप लगाकर वारली चित्रकला को दुनिया के सामने रखा यह चित्र को बहुत ही प्रसिद्धि मिली और कला प्रेमियों में यह चित्रकला की बहुत मांग उठी उसके बाद वारली चित्रकला दुनिया के विविध चित्र प्रदर्शनों में समाविष्ट हो गई जिव्य सोमा माशे जी के वारली चित्रकला के लिए उन्हीं सौ छिहत्तर में नेशनल अवॉर्ड फॉर द ट्राइबल आर्ट से सम्मानित किया गया

उसके बाद उन्हें उनके प्रख्यात चित्र प्रदर्शन के लिए दो हज़ार दो में सिर्फ गुरु और दो हज़ार नौ में प्रिंट्स क्लाउस बोर्ड से सम्मान मिला

जिव्य सोमा माशे जी ने वारली चित्रकला का डंका पूरी दुनिया में बजा दिया उसके चित्र प्रदर्शनों में देश भर में होते थे और विदेशों में भी उसकी बहुत ही तारीफ होने लगी सन दो हज़ार ग्यारह में भारत के राष्ट्रपति द्वारा भारत के नागरिक के चौथा क्रमांकित पद्मश्री अवॉर्ड से जिव्य सोमा माशे जी को पुरस्कृत किया गया

वारली चित्रकला आदिवासी संस्कृति और जीवन शैली तथा प्रकृति के तमाम तत्व और जीवो को बहुत ही संवेदनशीलता से दिखाता है यहां रेखाचित्रों में आदिवासी संस्कृति की परंपरा रीति रिवाज मृत्यु तथा प्रसूति के जीवन और निर्जीव तत्वों का लगा बहुत ही स्पष्ट रूप से नजर आता है जिसे गहराई से एक कलाकार की नजर से सूक्ष्मता से मूल्यांकन किया जाए तो प्रकृति में आए तमाम तत्व जैसे अग्नि, जल, आकाश, वायु, पृथ्वी तथा जीवो  के पारस्परिक संबंधों की जीवंतता गतिशीलता ताल क्रमबद्ध सहजीवन को अभिव्यक्त करता है

वारली चित्रकला में आदिवासी जीवन शैली और संस्कृति के उमंग उल्लास और जीवंतता को प्रकृति के तत्वों से एक धागे में बांधकर मानव और प्रकृति के बीच के संबंधों का सरलता से दिखाने का प्रयास किया गया है

आदिवासी प्रकृति से और प्रकृति आदिवासी से है आदिवासी का प्रकृति से एक अलौकिक संबद्ध है वो दिन अब दूर नहीं है कि दुनिया को जीने के लिए फिर प्रकृति के नियम अनुसार उसके शरण में आना पडेगा एक चित्र जो के हजारों शब्दों का अर्थ बयान करता है उस हिसाब से देखें तो प्रकृति के संपूर्ण सजीव तथा निर्जीव तत्व मनुष्य, पशु, पंछी, प्राणी, जीव, जंतु, चांद सितारे, सूर्य, पर्वत, नदी नाले तमाम को वारली चित्रकला ने रेखाचित्रों में समाविष्ट करके प्रकृति के सनातन सत्य और रहस्यों को प्रदर्शित किया है

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प्रकृति का चक्र चलता रहता है वहां स्थिर नहीं होता दिन हो या रात सुबह हो या शाम परंतु प्रकृति मैं सब जीवंत और गतिमान है इसी भावना को वारली चित्रों में चित्रित किया गया है

वारली चित्रकला अद्भुत है उसकी भावना सत्य है उसकी बातें रोचक है इसके चित्र दुनिया को प्रकृति तथा आदिवासी संस्कृति का संदेश देता है अपनी अगली पीढ़ी को आशीर्वाद तथा विरसत और अकूत संपत्ति देता है वारली चित्र सही मायने में जीने का मकसद है हमें इस परंपरा को और प्रकृति को शुद्ध तरीके से बचाए रखना चाहिए जिससे हमारे पूर्वजों का प्यार को संस्कार आने वाली पीढ़ी में सुख और शांति और सुकून बक्से

तारीख 15 मई 2018 को वारली चित्रकला को आसमान की बुलंदियों पर पहुंचाने वाले वारली के सितारे पद्मश्री जिव्य सोमा माशे प्रकृति के पंचतत्व में सदा के लिए विलियन हो गए जिव्य सोमा माशे जी का पार्थिव देह को भारत के रास्ते में लपेटकर पुलिस जवानों ने सलामी देकर सम्मानित किया यह किसी आदिवासी कलाकारों को देश से मिलने वाला बड़े सम्मान की शायद पहली घटना होगी

आदिवासी संस्कृति और जीवन शैली तथा प्रकृति के प्यार को पूरी दुनिया से परिचित कराने वाले जिव्य सोमा माशे जी को हमारी भावपूर्ण श्रद्धांजलि | दोस्तों में आशा करता हु आपको हमारी वारली पेंटिंग क्या है यह पोस्ट पसंद आई हो इसे अपने आदिवासी बाइयो के साथ जरूर शेयर करे जय आदिवासी जय जोहर | 

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